अघोराचार्य के छठी समारोह, लोलार्क छठ
17 September 2026
अघोरपीठ में अघोराचार्य के छठी समारोह, 'लोलार्क छठ', पर उमड़ा आस्था-विश्वास का जनसैलाब
काशी को देवी-देवताओं के अनुमानित आदिकालीन ठौर-ठिकानों में गिना जाता है । लेकिन देवादिदेव महादेव की नगरी होने का ख़िताब काशी को शर्तिया तौर पर हासिल है । कहते हैं काशी में शिव का निवास, अमूमन, दो स्थानों पर होता है । एक है 12 ज्योतिर्लिंगों में से शिवलिंग रूप में विराजत काशी विश्वनाथ जी का 'काशी विश्नाथ मंदिर' और दूसरा स्थान है समाधि व् स्थूल या मूर्तिवत स्वरुप बाबा कीनाराम जी का 'बाबा कीनाराम स्थल, क्रीं-कुण्ड' । भगवान् शिव की रुद्र मुद्रा को परिभाषित करता, अघोर परंपरा का, यह आदि-अनादि कालीन सिद्धपीठ 'बाबा कीनाराम स्थल, क्रीं-कुण्ड' आध्यात्मिक क्षेत्र का सिरमौर है ।
यह स्थान अघोर के वर्तमान स्वरुप के सर्वमान्य आराध्य-ईष्ट-अधिष्ठाता व् आचार्य अघोराचार्य महाराजश्री बाबा कीनाराम जी की तपोस्थली के तौर पर पूरी दुनिया में विख़्यात है । बाबा कीनाराम जी को अध्यात्म की दुनिया में साक्षात शिव की स्थूल काया के रूप में माना और जाना जाता है । इस स्थान पर रोज़ाना की संख्या में हज़ारों लोग आते हैं । कुछ कौतूहल से, कुछ लोग दर्शन मात्र के लिए तो कुछ साधना की दृष्टि से यहां आते हैं । लेकिन कुछ अवसर ऐसे होते हैं जब यहां पर दर्शनार्थियों की संख्या कई हज़ारों में पहुँच जाती है ।
ऐसा ही एक अवसर होता है 'लोलार्क छठ' पर्व का । ये पर्व बाबा कीनाराम जी, के जन्म के छठवें दिन मनाए जाने वाले 'छठी समारोह' के तौर पर कई सौ सालों से मनाया जाता है । पूरी दुनिया के अघोर श्रद्धालुओं के साथ-साथ इस परंपरा के सभी साधू-संत-महात्मा-साधक-अनुयायी इस पर्व को अगाध आस्था और विश्वास के साथ मनाते हैं ।
यूँ तो ये पर्व अघोर परंपरा के हरेक आश्रमों में उत्साह के साथ मनाया जाता है लेकिन बाबा कीनाराम जी की तपोभूमि और अघोर परंपरा के विश्वविख़्यात केंद्र, महान सिद्धपीठ, 'बाबा कीनाराम स्थल, क्रीं-कुण्ड' में इसका नज़ारा अदभुत होता है । इस दिन, यहां पर, भक्तजनों के साथ-साथ दुनिया भर के अघोर पथिकों, साधू-सन्यासियों, सिद्ध महात्माओं का यहाँ जमावड़ा लगता है ।
इसी कड़ी में 2026 का 'लोलार्क छठ' (लोलार्क षष्ठी) 17 सितंबर को अपार जनसमुदाय की उपस्थिति में अगाध श्रद्धा व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया । 17 सितंबर को सुबह आश्रम परिसर की साफ़-सफ़ाई और दैनिक आरती के बाद इंतज़ार शुरू हुआ बाबा कीनाराम जी , अघोरेश्वर महाप्रभु बाबा भगवान् राम जी सहित परिसर में मौज़ूद अनेकों समाधि और बाबा कीनाराम जी के पुनरगामित स्वरुप और इस सिद्धपीठ के वर्तमान (11वें) पीठाधीश्वर अघोराचार्य महाराजश्री बाबा सिद्धार्थ गौतम राम जी के दर्शन का ।
और जब सुबह हुई तो हमेशा की तरह नज़ारा अद्भुत था । शिव के मूर्तिवत व् समाधि रुप के साथ-साथ शिव की स्थूल काया के वर्तमान स्वरुप को देखने की ललक हज़ारों दर्शनार्थियों के चेहरे पर साफ़ दिख रही थी । यहाँ एक ज़िक़्र प्रासंगिक है । वो ये है कि अध्यात्मिक शोध व समझ आधार पर भक्तजनों के बीच एक आम धारणा पुष्ट हो चली है कि अघोराचार्य महाराजश्री बाबा सिद्धार्थ गौतम राम जी कोई और नहीं बल्कि स्वयं अघोराचार्य महाराजश्री बाबा कीनाराम जी का पुनरगामित स्वरुप हैं । ज़ाहिर है ये अविश्वसनीय दृश्य होता है ।
ऐसे में सुबह 9 बजे सम्पूर्ण संसार में समस्त अघोर परंपरा के सर्वमान्य आचार्य-ईष्ट-आराध्य तथा शिव की स्थूल काया माने जाने वाले बाबा सिद्धार्थ गौतम राम जी जैसे ही अपने कक्ष से बाहर आए तो घंटा-डमरु -शंख और 'हर हर महादेव' के निनाद के साथ पूरा अघोर परिसर गगनभेदी उदघोष से गूँज उठा ।